करवटे बदलते रात यूही गुजर जाती है
जब दिन ढलता है और शाम नजर आती है
मन के गुबार आंखो से झलकते है
जब सफर चलते उन पलो की याद आ जाती है
जीने को मचल उठता है ये दिल
उन बीते पलो को फिर से
पर होश आने पर मेहसूस यही होता है
जो बोझ रखा है अब तो उतारना है सिर से
फिर ज़िन्दगी उन्ही उलझनो मे सिमट के रह जती है
जिनके सुलझने की आस ही नही
और वो पल सिर्फ ख्वाब बन जाते है
जिनके जीने की आस भी नही
जब बीतती है खुद पर, तो महसूस यहि होता है
ज़िन्दगी लगी है दाव पर, फिर भि दिल रुसवा ही रहता है।