Wednesday, 17 February 2016

कहे अनकहे पलो को जीने की चाह

करवटे बदलते रात यूही गुजर जाती है
                         जब दिन ढलता है और शाम नजर आती है
मन के गुबार आंखो से झलकते है 
                          जब सफर चलते उन पलो की याद आ जाती है

जीने को मचल उठता है ये दिल 
                          उन बीते पलो को फिर से
पर होश आने पर मेहसूस यही होता है
                          जो बोझ रखा है अब तो उतारना है सिर से

फिर ज़िन्दगी उन्ही उलझनो मे सिमट के रह जती है  
                           जिनके सुलझने की आस ही नही
और वो पल सिर्फ ख्वाब बन जाते है 
                           जिनके जीने की आस भी नही

जब बीतती है खुद पर, तो महसूस यहि होता है
                            ज़िन्दगी लगी है दाव पर, फिर भि दिल रुसवा ही रहता है।

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